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Thursday, 2 June 2011

बाबा की बाबागीरी

जन लोकपाल बिल के मुद्दे को लेकर जिस प्रकार समाजसेवी अन्ना हज़ारे अनसन पर बैठे और पूरे देश का व्यापक समर्थन प्राप्त किया| परिणामतः सरकार को उनके आंदोलन के समक्ष झुकना पड़ा और अन्ना का आंदोलन सफल हुआ| लेकिन अब अन्नागीरी के बाद बाबागीरी की बारी आई है| अब बाबा रामदेव कालेधन के मसले को लेकर आंदोलन को तैयार हो गये हैं और उन्हे अत्यधिक जनसमर्थन भी मिलने की पूरी उम्मीद है| आलम ये है कि उनका आंदोलन शुरू होने के पहले ही सरकार उनके आगे नतमस्तक दिखाई दे रही है| जिससे संकेत मिल रहा है कि बाबा का भी आंदोलन जरूर सफल होगा | यही हमारी और संपूर्ण देश कि उम्मीद है|

Friday, 4 March 2011

मजबूरी की दास्तां--"गजल"


हमारे प्रधानमंत्री माननीय मनमोहन सिंह जी ने प्रैस वार्ता मे हमे बताया की क्यों वे भृष्टाचार और घोटालों पर लगाम लगाने मे नाकाम हैं और अपनी मजबूरी की दास्तां सुनाई! मै आज  उसी दास्तां-ए-पीएम को गजल रूप मे प्रस्तुत कर रहा हूँ!
गौर फरमाइएगा-----

क्यों गठबंधन के धर्म मे मजबूर हो गए,
इतने हुए मशहूर की हम चूर हो गए!

क्या मिल गया इस देश की गद्दी संभाल कर,
इतने हुए बेबस हम, कमजोर बन गए!


भृष्टाचार के जहर ने हमे लाचार कर दिया,
घोटालों के सब घाव अब नासूर बन गए!

इतने किए हैं नाम कि बदनाम हो गए,
मजबूर एक इंसान की मिसाल बन गए!

ऐ मीडिया वालों बस इतनी कृपा करो,
अब न इस तरह से तुम रुसवा हमे करो!!

Wednesday, 23 February 2011

स्वर्णिम भारत का अंधकारमय भविष्य!!

जिन बच्चों को हम भविष्य के कर्णधार एवं सूत्रधार के रूप मे देखते हैं! जिन बच्चों मे हमे भावी नागरिक का प्रतिबिंब दिखता है क्या आज उन बच्चों का वर्तमान इतना अधिक हीन हो सकता है? जिन बच्चों को हम सोचते हैं कि भविष्य मे देश का संपूर्ण दायित्व उनके कंधों पर होगा, आज वही बच्चे दो वक्त कि रोटी के लिए वर्तमान से संघर्ष कर रहे हैं|
प्रायः हम देख सकते हैं कि जिन बच्चों के हाथों मे कलम व किताब होनी चाहिए, जिनका वर्तमान विद्यालयों मे व्यतीत होना चाहिए, वही बच्चे आज होटलों एवं ढाबों मे जूठे बर्तन साफ करते मिल जाते हैं| और जिन बच्चों को कालेजों मे होना चाहिए, वे बच्चे मज़दूरी करते दिखते हैं|
एक और इससे भी अधिक बुरा कार्य है जिसमे अधिकतर गरीब परिवार के बच्चों का बचपन व्यतीत हो रहा है, और वह है भीख माँगने का| सड़क पर बच्चे हाथ मे थाली या कटोरा लिए भीख मांगते आसानी से देखे जा सकते हैं| और वे ऐसा करें क्यूँ न? आज उन्हे खाने के लिए दो वक्त कि रोटी नही नसीब होती है और जो खाने के दाने दाने का मोहताज़ है, वह भीख न मांगे, होटलों मे बर्तन न साफ करे, ,मज़दूरी न करे, तो और क्या करे? ऐसे हालात मे उन्हे शिक्षा प्राप्ति के लिए सोचना भी गुनाह है|
इनके खेलने कूदने एवं शिक्षा प्राप्ति के दिन भिक्षा माँगने एवं मज़दूरी माँगने मे व्यतीत हो रहे हैं| ऐसे मे उनके माता पिता ही क्या कर सकते हैं जो खुद गरीबी मे ज़िल्लत की ज़िंदगी जी रहे हैं| इन लोगों के लिए शिक्षा की कोई अहमियत नहीं है एवं निरर्थक है क्योकि क्योकि जीवन जीने के लिए पहले तो अपने पेट की अग्नि को शांत करना होता है, जब यह अग्नि शांत होगी तभी दिमाग आगे करने के लिए सोचेगा| लेकिन ऐसा हो तब ना|
सरकार भले ही शिक्षा प्रसार के लिए कितने ही कदम उठ ले, कितने ही गरीबी हटाओ अभियान चला ले, सब बेकार है| सरकार की योजनाएँ जैसे सर्व शिक्षा अभियान,निः शुल्क शिक्षा आदि सब कागजी ही प्रतीत हो रहे हैं| भले ही सरकार शिक्षा के क्षेत्र मे पैसे लूटा रही है पर वास्तविकता कुछ और ही है|
क्या यही है हमारा स्वर्णिम एवं विकाशशील भारत? क्या यही बच्चे है हमारे देश के भावी सूत्रधार ?